Friday, 25 April, 2008
फंडा चियर चियर का
Sunday, 20 April, 2008
कौन बनेगा पत्रकार नंबर वन मे आपका स्वागत है
Saturday, 19 April, 2008
आई. पी.एल और बहन मायावती
IPL IPL IPL, हर तरफ यही हल्ला मचा है. गोया देश में और कुछ हो ही नही रहा है. अब तक १०० से ज़्यादा बार लोंगो को बता चुका हूँ कि 'भैया' लोंगो कि कोई टीम नही है. बस मन मे ही कई नाम लिए घूम रहे है, लखनऊ नवाब, प्रयाग चैलेनज़र और ना जाने क्या क्या. अजीब सा धर्मसंकट है, हर किसी के पास एक पहचान है.ऐसा हो गया ही कि अगर आपकी कोई टीम नही है तो समझो आप आउटडेटेड हैं. अगला बंदा तरस ख़ाके बोलता है कि कोई बात नही यार अगर यू.पी कि टीम नही है तो तू मेरी टीम को सपोर्ट कर ले . इतना गुस्सा आ रहा है बहन मायावती पर, एक टीम खरीद लेती तो का हो जाता भाई. अरे अभी ताजमहल के अलावा कई चीज़ें हैं यू.पी में बेचने को. अबकी जन्मदिन पर IPL चंदा का नियम हो जाता तो क्या बुरा था. मुलायम भाई भी नही सुन रहे, अनिल अंबानी जी से गहरी दोस्ती है, उनही से कह के एक टीम का जुगाड़ फिट कर देते तो अगले चुनाव मे अच्छा चांस रहता. अब बड़ी मुश्किल हो गयी है आफ़िस जाने में, विदेशी भाई लोंग भी एक एक टीम चुन लिए हैं और लगा रहे है नारा. खुन्न्स खाए हुए हमने अपनी माताश्री फोन किया और पूछा जल्दी बताओ कि क्या हमारे ख़ानदान में कोई मोहाली, बंगलूर, बंबई, दिल्ली, या चेन्नई से है क्या.जवाब आया, कोई प्रतापगढ़ और इलाहाबाद के बाहर से नही आया है और तुम चेन्नई कि बात कर रहे हो. अफ़सोस, ये आप्शन भी गया. तभी एक मित्र ने आइडिया दिया कि जो खिलाड़ी सबसे ज़्यादा पसंद हो उसी कि टीम के साथ तुम भी हाल्लियाओ. ये आइडिया भी फेल, शोएब अख़्तर पसंद हैं, पर वो तो पाकिस्तानी तमाशे का शिकार हो गये हैं. हे राम, पहला मैच आ भी गया और हम अभी भी धर्मसंकट मे थे. लेकिन पहले मैच ने ही हमे दिशा दिखाई, अब कर्नाटक में है तो ज़्यादा लोंग बंगलूर को ही चीयर कर रहे थे, हमने आदतन उल्टी राह पकड़ी और कोलकाता के लिए लगे चिल्लाने. प्रयास व्यर्थ नही गया और हम जीत गये. आहा अब पहचान है हमरे पास, कोरबो, लोरबो, ज़ीतबो रे. आप लोंगो का क्या हाल है?
Friday, 18 April, 2008
Laal Salam in Nepal
Tuesday, 15 April, 2008
Life Goes On
After reading Jyoti Sanyal's obituaries....
There is only one single moment between life and death. So often, there isn't any time for goodbye's. Whatever you've left behind is all that there is; there may never be that final moment to set things 'right'. Somewhere, sometime, I remember someone telling me... There is no certainty in life, so live every minute as if its your last. Enjoy every moment of your life to the fullest, and don't regret what you couldn't do. Take life's simple pleasures seriously - a sunrise, the breeze on a hot day, the sound of waves as they crash against rocks, the smile of a friend, the tears through which the smile slips out.... Enjoy the laughter of the ones you love, the mischief of the little fellows even when you're tired, and remember that life is beautiful.... if you only let it be. Talk to the people who matter to you, and don't be afraid to tell the people who matter, that they do. Don't ever say, 'I'll do it tomorrow", for there may not be any tomorrow. And yesterday is history, so don't hold any grudges, and look forward to every new day. And you will die a happy man, you will die a free soul....
When there is only one life (that we will remember), live it in a way that you choose... there will always be people who will appreciate you only after you are gone, there will always be those that malign you, but be the man you would want to admire, and other's will surely admire you. Don't aspire to gain their admiration, you will only fall. Live to please yourself, while being considerate of others, and you will find that the world will make space for you.
Friday, 11 April, 2008
रंगों की दुनिया
एक घुटन सी होती है. सब कुछ रुका सा लगता है. मन में एक अज़ीब सा अंतर्विरोध है. अंदर से एक आवाज़ चीख चीख के कहती है कि इस मायाजाल को समाप्त करो. सब रेत पे पड़े पानी की तरह है कब उड़ जाएगा पता नही. सब तरफ एक अज़ीब सी बनावट है और हर चीज़ रंगी हुई है. कुछ देखना है तो रंग कुरेदना होगा पर कैसे? ये रंग तो चिपक गया है और निकलता ही नही. इन रंगो की बेरंग होली मे हम भी कही गहरे डूबे नज़र आते हैं. मन कहता है चल रे अपने देश, जहाँ रंग लगेगा भी तो कम से कम मिट्टी की महक तो साथ होगी. मन मे उत्साह होता है पर कदम साथ नही देते. इन कदमों को शायद मायावी दुनिया की ज़्यादा समझ है. ये अर्थशास्त्र के आकड़ों को बेहतर समझतें हैं. मन कहता है भाड़ मे जाए अर्थशास्त्र और मायाजाल अपनी तो खाक गंगा किनारे ही लिखी है. मन के बस मे शरीर नही है और आज के युग का सच भी शायद यही है. मेरे अंदर ये अंतरयुद्ध चलता रहता है, जाने क्यूँ आज लिख दिया.





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